चनमन बाबू की चउचक Love Story

तीन सौ साल नहीं..बात आज से तीन साल पहले की है. उस समय सहिष्णुता अपने उच्चतम स्तर को क्रास करने के लिए मचल रही थी..समाजवाद फैल कर पसर रहा था…वामपंथ में दक्षिणपंथ ऐसे घुस गया था मानों बाजरे के खेत में साँड़ घुस गया हो..हाँ संघ अब संघ न रहा था…यहाँ तक कि सभी कामरेड सुबह सुबह गांजा पीने के बाद हनुमान चालीसा अवश्य पढ़ते थे.

सद्भाव का अद्भुत नजारा

हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई इतने प्रेम से रहते थे कि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक को पुनः परिभाषित करने के लिए वाड्रा साहब के खेतों में स्थित पुदीने की बागान में एक सर्वदलीय बैठक बुला ली गयी थी…देश में दंगा-फसाद जैसे शब्दों के मायने लोग टॉर्च लेकर ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में खोजते थे.

महान नेता और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

हमारा पीएम जब बोलता था तो लगता था कि इक्कीसवीं सदी में ऐसा महान वक्ता न हुआ न होगा..पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर ससम्मान वापस देकर भारत सरकार को इस्लामाबाद में चाय-बीड़ी, सिगरेट, कमला पसंद की दूकान खोलने का ऑफर दे दिया था। और साथ ही ये भी कहा था कि यदि वाड्रा साहेब चाहें तो यहाँ के खेतों में भी पुदीने की खेती कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी और कला-जगत के चमत्कार

और तो और… बोलने की आजादी इतनी थी कि मेरे मोहल्ले का पिंकुआ तक किसी के भी माँ-बहन के नाम का तेज तेज स्मरण करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेता था। फ़िल्म ‘रॉ वन’ को ऑस्कर में छत्तीस पुरस्कार मिले थे। हनी सिंह को शास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दे दिया गया था। उस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार बराक ओबामा से छीनकर सिरिमती सनी लियोन को देने का फैसला किया गया था।

आर्थिक समृद्धि का अद्भुत दौर

महंगाई की नानी का इंतकाल हुए दस दिन ही हुए थे। पेट्रोल पाँच रुपये में सवा लीटर। आटा पचहत्तर पैसे में पौने तीन किलो। दाल तो नमक खरीदने पर ही फ्री मिल जाती थी। और नगरपालिका दिन में दस बजे पानी की सप्लाई की जगह सरसों तेल की सप्लाई करता था। दारु खरीदने पर बीमा हो जाता था। देश में इतना FDI आ गया था कि सरकार ने देश की सभी सीमाओं पर “नो एफडीआई” का बोर्ड लगा लिया था। देश सोने की चिड़िया बनकर उड़ रहा था। इस क्यूट से रामराज्य में सभी लोग सुख-शांति पूर्वक खेल रहे थे।

नायक का आगमन: चनमन बाबू की कहानी

इसी भयंकर प्रेममय और रोमांटिक माहौल में एक अद्भुत घटना हुई.. हुआ क्या कि हमारे चनमन बाबू अपने बागी जिला बलिया, उत्तर प्रदेश से पीट-पीटाकर पढ़ने के लिए बनारस जिला में पधारे।

पिता की इच्छा बनाम पुत्र का सपना

आपको बता दें चनमन बाबू के पापा सीरी बाबू जलेला उर्फ़ छनमन सिंह, सभी मिडिल क्लास पापाओं की तर्ज पर अपने बेटे को बीटेक करा के इंजीनियर बनाना चाहते थे। लेकिन चनमन बाबू विद्रोही स्वभाव के। उन्हें बीटेक से घोर एलर्जी थी।

हिंदी साहित्य की ओर रुझान

एक दिन संयोग से वो सरस सलिल पढ़े और उनका झुकाव हिंदी साहित्य में हो गया। सो उन्होंने आगे चलकर साहित्य अकादमी प्राप्त लेखक बनने का सपना देखा… वो बहुते क्यूट थे.. इतने प्यारे और भोले थे कि उनको देखकर कोई नहीं कह सकता था कि ये लौंडा अपने मम्मी-पापा के मनोरंजन मात्र का रिजल्ट है।

पीएचडी की तैयारी और अप्रत्याशित मोड़

वो हिंदी साहित्य से एमए कर चुके थे। आगे जब करने को कुछ नहीं बचा, न ही करने को कुछ मिला तो परंपरा के अनुसार सोचा कि क्यों न पीएचडी कर लिया जाय… वो जानते थे की कुछ न करने से अच्छा है पीएचडी करना।

प्रेम का आगमन: रोजी से पहली मुलाकात

एक दिन चनमन बाबू जब बनारस के पक्का महाल में खड़े होकर दूध पी रहे थे तभी एक अल्हड़ सी लड़की इनसे टकरा गयी। उस अल्हड़ को देखकर उनका कुल्हड़ धराशायी हो गया… लड़की का नाम रोजी था। उस सुंदरी को देखने के बाद लगता था कि मानों उपर वाले ने आलिया भट्ट और श्रद्धा कपूर के साथ काजल अग्रवाल को मिलाकर अपना मिक्सर-ग्राइंडर ऑन कर दिया हो… जो भी उसे देखता… देखता ही रह जाता था।

प्रेम का पहला चरण: जब दिल में बजा राष्ट्रगान

चनमन बाबू के मनो-मस्तिष्क पर उसका रूप-लावण्य इस कदर छा गया था कि जब उसे देखते तो उनके दिल में राष्ट्रगान बजने लगता था.. वो जहाँ रहते, खड़े हो जाते थे… चनमन बाबू का प्यार माउंट एवरेस्ट चढ़ने लगा।

ढाई आखर प्रेम का पाठ

उन्होंने रामराज्य को याद किया और सोचा क्यों न पीएचडी करने से पहले इस नाजनी से प्रेम कर लिया जाय… सो शोध को रामराज्य के हवाले छोड़कर ढाई आखर प्रेम का पाठ पढ़ने के लिए उन्होंने उस लड़की के कोचिंग में एडमिशन ले लिया।

प्यार में पप्पू होने की कला

मित्रों, जैसा कि आप जानते हैं कि आदमी प्यार में राहुल गांधी हो जाता है और जिंदगी कांग्रेस हो जाती है.. हमारे चनमन बाबू भी प्यार में पप्पू हो गए थे। करते कुछ थे, हो कुछ जाता था.. बोलना कुछ और चाहते थे और मुँह से कुछ और निकल जाता था… कॉपी-कलम-किताब में मोदी ही मोदी की जगह सिर्फ रोजी ही रोजी दिखती थी।

प्रेम में दीवानगी की हदें

वो इतवार के दिन भी पढ़ने के लिए कोचिंग पहुँच जाते थे… सजने-संवरने के चक्कर में कई बार डियो की जगह रूम फ्रेशनर से भी काम चला लेते थे… प्यार में कालजयी कविता लिखने का प्रयास भी करने लगे थे:

“चले थे पीएचडी करने चनमन
ये तो रोजी से इश्क कर बैठे…”

हालात की गंभीरता और पहला प्रस्ताव

मतलब कि इस दिल-ए-मरीज़ की हालत सीरिया की हालत से भी ज्यादा गंभीर हो गयी थी.. पढ़ते-पढ़ते छह महीना बीत चुके थे। लेकिन इस प्यार के शोध-प्रबंध की सिनॉप्सिस ही अधूरी थी। समझ में नहीं आता था कि उस नाजनी से हाल-ए-दिल कहें तो किस तरह कहें।

एक दिन हिम्मत करके चनमन बाबू घर से निकले और तेज-तेज साइकिल चलाकर कोचिंग जरा जल्दी पहुँच गए। और उधर से इठलाती-बलखाती आ रही उस हुस्न की गाड़ी के आगे ब्रेक लगाकर परम रोमांटिक अंदाज में कहा:

“आदरणीया रोजी जी, आपके इस अद्भुत, अनुपम, दिव्य सौंदर्य को देखकर मुझे रीतिकाल के सारे कवियों पर तरस आता है। मने कि आप मुझे इतनी अच्छी लगती है कि मन करता है कि मैं भी अपना नाम रोजी रख लूँ।”

पहला झटका: चप्पल का डर

बस क्या था, रोजी पिंक गई.. और खूब तेज से जवाब देते हुए घर चल दी… “एकदम आवारा हो.. लुच्चे कहीं के.. कोई काम नही.. घर में माँ-बहन नहीं है?”

चनमन बाबू को घोर निराशा हुई.. साला रामराज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तक नहीं। “हाय.. अरमानों के साथ ये मज़ाक..” उन्हें यकीन हो गया कि यही हाल रहा तो साल-दो साल में फाँसीवाद आ जाएगा।

हार न मानने वाला बलिया का बीर

लेकिन चनमन बाबू बागी बलिया जिला के वीर.. हार नहीं मानने वाले थे… दो-चार दिन लगातार उस हुस्न की गाड़ी का पीछा करने के बाद भी जब कुछ न उखड़ा.. तो उन्होंने लड़की का फोन नंबर जुगाड़ किया और बड़े प्यार से फोन करते हुए कहा:

“रोजी जी… इतना मैं भगवान के पीछे पड़ा होता तो वो भी आज द्रवित होकर हृदय से लगा लेते… आपको मुझपर दया नहीं आती..?”

रोजी का आध्यात्मिक जवाब

रोजी का दिल पसीजा… और उसने बड़े ही आध्यात्मिक अंदाज में कहा: “देखिये चनमन बाबू, मैं बहुत शरीफ लड़की हूँ.. मेरे ऑलरेडी तीन-तीन बॉयफ्रेंड हैं और तीनों देखने में एकदम रणबीर कपूर… तीनों आपकी तरह घास नहीं छीलते.. तीनों बीटेक करते हैं… आया न समझ? आज से पीछा न करियेगा… मैं उसमें की नहीं हूँ… बाय…”

सपनों का धुँआ-धुँआ होना

हाय… चनमन बाबू का सपना धुँआ-धुँआ होकर अब बनारस के आसमान से फैलने लगा। न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम टाइप फीलिंग लेकर उन्होंने रामराज्य के साथ अपने पिता चनमन सिंह उर्फ़ बाबू जलेला को खूब कोसा: “हाय पापा, हम बीटेक क्यों न किये? काहें हम हिंदी पढ़ने लगे? काहें मति मरी गयी थी?”

रीतिकाल का साक्षात्कार

चनमन बाबू बड़े रोये और उस दिन लगा कि रीतिकाल के कवि बोधा ने सही कहा था:

“ये प्रेम के पन्थ कराल है जू
तरवारि के धार पर धावनो है”

झा जी की सलाह: इंग्लिश स्टाइल में प्रपोज

लिजिये, उन्हें रोते हुए देखकर परम चरित्रवान झा जी से रहा न गया। उन्होंने चनमन बाबू का उत्साहवर्धन किया और सलाह दे दी: “अबे देख, वो इंग्लिश स्टाइल है यार… क्या ये सब आदरणीया रोजी जी, बैकवर्ड कहीं के.. अरे यार, इंग्लिश में प्रपोज करो।”

अंतिम प्रयास: आई लव यू

चनमन बाबू को झा जी की बात समझ में आ गयी। बस क्या था… एक दिन रोजी आती हुई दिखी… चनमन बाबू के इश्क का हुक्का जल उठा। उन्होंने रोजी से कहा: “आई लव यू सो मच रोजी जी।”

चप्पल का फलसफा

रोजी ने हाथ में चप्पल निकाला और चनमन बाबू को दिखाकर कहा: “आज से दिख गए तो पुलिस बुला लूंगी… आया न समझ? कमीने, लुच्चा, आवारा. अपना मुँह देखो हो कभी… क्या समझते हो मुझे तुम… आयं?”

भक्तिकाल में तब्दील रीतिकाल

चनमन बाबू को काटो तो खून नहीं… सारा रीतिकाल अब भक्तिकाल में बदल गया.. चनमन बाबू का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया… रामराज्य से भरोसा उठ गया… उन्हें फाँसीवाद की आहट होने लगी।

साहित्य अकादमी स्तर की कविता

वो खूब रोकर रामराज्य की ऐसी-तैसी की और अपनी लव स्टोरी के अंत में एक साहित्य अकादमी टाइप कविता लिखी, जिसे सदी की दस महानतम कविताओं में गिना जाता है:

“अब उसके हाथ में चप्पल दिखाई देता है
मेरा इश्क अब मुकम्मल दिखाई देता है।”

उपसंहार: चनमन बाबू की प्रेम कथा का समापन

चनमन बाबू की लव स्टोरी यहीं समाप्त होती है, लेकिन यह कहानी हर उस प्रेमी के दिल की आवाज़ है जिसे प्यार में सिर्फ चप्पलें मिलीं, तालियाँ नहीं। बनारस के घाटों पर आज भी अगर कोई उदास बैठा दिखे, तो समझ लीजिए वो या तो झा जी हैं या फिर चनमन बाबू।

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