गंगा आरती की तैयारी और घाटों का नजारा
कार्तिक पूर्णिमा से तीन दिन पहिले शाम का समय… गंगा आरती की तैयारी… पर्यटकों और नाव वालों में पैसे को लेकर बहस… पानी का श्रृंगार करतीं नावें… घाट के बसिंदों में देव दीपावली का अलग जोश… दसास्वमेध से दाहिने मुड़ते ही शीतला घाट.. आगे मुंशी घाट… फिर दरभंगा घाट भी… उसके आगे चौसट्टी घाट… थोड़ा आगे बबुआ पांडे घाट।
हिप्पियों का काफी हाउस
वहीँ एक छोटे से मन्दिर के बगल में गुमटी से सटी चाय और सिगरेट की दूकान… मने हिप्पियों का काफी हाउस… वो सुबह जहाँ आपको योगा करते दिख जाएंगे वहीँ शाम को गिटार बजाकर बीथोवेन या द बीटल्स को गुनगुनाते, झुमते, गलबहियां लड़ाते, एक दूजे को चूमते बेफिक्र बेपरवाह… लगता नहीं की उन्हें दुनिया की कोई फिक्र है… ग्रीस दिवालिया हो जाय या सीरिया बर्बाद हो जाए… उनके लिए हमेशा जश्न है।
झा जी: टैलेंट की दूकान
चाय और सिगरेट में इन हिप्पियों ने एक प्रतिस्पर्धा पैदा की है… ये झा जी मानतें हैं… वैसे झा जी ये भी मानते हैं की ई भांग और गांजा भी पीतें है सरवा.. भक भक बसातें हैं.. पर शराब पीते नहीं देखा आजतक… शायद हिप्पीओं का दिल नहीं टूटा इनकी तरह।
झा जी मने टैलेंट की दूकान… सुंदर मुख, घुंघराले बाल, गौर वर्ण… बिरजू महराज की चाल.. गाना बजाना नाचना.. चित्रकार भी… ख्याल ठुमरी और विद्यापति से लेकर मेहँदी हसन तक को गवा लीजिये… ढोलक, तबला, हारमोनियम बजवा लिजिये.. या वान गाग या राजा रवि वर्मा की पेंटिंग की बारीकियां पूछ लीजिये… या मधुबनी पेंटिंग की खासियत… सब में माहिर हैं।
बनारस आने की दास्तान: राम से कृष्ण बनने की कीमत
अभी संस्कृत विश्वविद्यालय में आचार्य के छात्र हैं.. इसके पहले आपको बता दें. आज से चार साल पहीले झा जी दरभंगा से बनारस आये… दरभंगा में इनके पिताजी की रामलीला मण्डली थी.. जिसमें ये राम बनते थे। एक बार हुआ यों की ऐसे ही किसी कार्यक्रम में एक सुकन्या इनके रूप लावण्य पर इस कदर मोहित हो गयी की उसे राम की बजाय इनमें कृष्ण दिखने लगे… झा जी ने उत्तम चरित्र का परिचय देते हुए उसे जनेरा के खेत में बुलाया… किसी लौंडे ने देख लिया.. हल्ला… “अरे ई का.. भगवान राम रासलीला कर रहें हैं.”.. बस इनकी हुई धुनाई… लंका पर चढ़ाई से पहले ही लंका दहन हो गया… पिताजी ने सबसे सार्वजनिक माफि माँगी… “अभी सोलह साल का है… बकस दीजिये इसे.”.. मण्डली की बेइज्जती न हो इस डर से ये संगीत सिखने बनारस आ गए… अब बेचारे पाँच साल से बनारस हैं।
दो घाटों की दो दुनिया
ठीक सुबह को बबुआ पांडे घाट पर चाय हाथ में लेकर हिप्पियों का योगा देखते हैं। कहतें हैं “मन शांत हो जाता हैं देखकर… शाम को दरभंगा घाट पर बैठते हैं। कहतें हैं “लगता है अपने घर बैठें हैं… धन्य हो दरभंगा महराज…”
सुबह शाम रोज का काम है… सुबह छूट जाए योगा पर शाम नहीं… शाम को उदास सा चेहरा लटकाये किसी के ख्यालों में खोये.. कभी कोई बन्दीस गुनगुनाते, कभी कोई ग़ज़ल के शेर, कभी पैर पर हाथ से कोई झपताल का टुकड़ा बजाते। बेवजह खुश होने की कोशिश के बावजूद उनके चेहरे पर साफ़ लिखा हुआ पढ़ा जा सकता है… “इस लड़के का दिल टूट गया है”।
प्यार की शुरुआत: नैनाचार और बोरो प्लस
आदत वस दसास्वमेध की ओर झाँककर देख लेतें हैं… शायद आएगी मुझसे मिलने… लेकिन क्यों आयेगी… दिल से हूक उठता.. अरे कौन आएगी? अरे वही जिसे दिल दे दिया था झा जी ने कभी.. इनके मकान मालिकन की बेटी.. तब वो बारह में पढ़ती थी और ये तेरह में यानी शास्त्री प्रथम वर्ष… पर प्यार की डिग्री झा जी को तीन दिन में ही मिल गयी थी.. एक दिन नल पर पानी भरते हुए नैनाचार हुए थे.. उसने कहा था ठेठ बनारसी में.. “तू बहुत अच्छा गावेला.” एकदम मनोज तिवरिया मतीन.. झा जी इस उपमा अलंकार से आहत होकर भी खुश थे.. और उसकी तरफ देखकर गुनगुना दिया… “बगल वाली जान मारेली”… सुनकर लड़की शरमाते हुए खूब हंसी थी।
तब झा जी उसके मकान में नए नए रहने आये थे… लड़की अल्हड़ सी इठलाती हुई चलती थी… तीन घण्टा बाल झाड़ती और तेईस बार शीशा देखकर बोरो प्लस लगाती… झा जी अपनी खिड़की से छुपकर उसे देखते थे… और ख्याल गाना छोड़ फिल्मी गाना गाते थे… “तुझे देखा तो ये जाना सनम”… उधर से अगली लाइन वो गुनगुनाती “प्यार होता है दीवाना सनम”… इतने में ही प्यार हो गया था।
देव दीपावली: जब दिया गवाह बना
ठीक तीन दिन बाद देव दीपावली आ गयी… झा जी शाम को देव दीपावली में दरभंगा घाट.. सात वार में नौ त्यौहार मनाने वाली काशी में उस दिन स्वर्ग उतर आया था।
अचानक से देखते हैं एक सुंदर सा मुख दिए की बाती सीधा कर रहा है… कभी दुपट्टा सम्भालता है.. कभी चेहरे पर लटके बालो को सीधा करता है… “अरे ये तो वही है बगल वाली… बाप रे आज सज संवरकर इतनी सुंदर… एकदम परी ।” मन ही मन झा जी मुस्कराये थे।
बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और उसने अपना नाम बताया- ज्योति यादव। ज्योति ने दिए में ज्योति जलाया था… जिसका प्रकाश दरभंगा घाट पर कम, दरभंगा वाले झा के दिल में ज्यादा फैल गया था… उनको एक पल लगा आज दिवाली नहीं, आज मेरी ईद है… सामने मेरा चाँद… देर तक निहारा था दोनों ने एक दूजे को… और वो सब कुछ बिना कहे हो गया था, जिसे कहने के लिए लोग तीन शब्दों का सहारा लेतें हैं… दिया गवाह था, ज्योति भी, गंगा भी और बनारस भी।
प्यार का रंग और मासूमियत भरा सफर
तब से मिलना जुलना शुरू… ज्योति को हरा रंग खूब पसन्द था.. झा जी को आलू के पराठे… वो अग्रसेन से पढ़कर घाट होते हुए घर जाती.. ये दरभंगा घाट पर रोज उसका इंतजार करते… सीढ़ियों पर उसके बनाये पराठे खाते.. वो बताती आज गंगा जी का पानी भी हरा हो गया है, आप इस हरे शर्ट में इतने स्मार्ट लग रहे हो कि… झा जी खूब हंसते… कौन समझाये इस पगली को, प्रेम दीवानी को, सावन के अंधे को… की ये तो प्यार का रंग है… और प्यार का रंग सबसे प्यारा है।
ये प्यार की गाडी सड़क पर नहीं बनारस के घाटों की सीढ़ियों पर दौड़ रही थी… कभी अस्सी, कभी मानमंदिर, कभी केदार घाट.. एक साल, दो साल, तीन साल… अनवरत.. पिक्चर, छोला, चाट.. गिफ्ट.. रूठना, मनाना, मिलना, बिछड़ना, रोना, धोना सब।
ब्रेक और बिछड़ना
अचानक से गाडी को ब्रेक लगा तब जब एक दिन ज्योति ने कहा “पापा को मालूम हो गया सब रात को… आप कल घर खाली करिये.. वरना आपकी खैर नही…” झा जी को सदमा लगा.. बात दरभंगा तक जाए और पिताजी को हार्ट के दौरे पड़ें.. इससे पहले झा जी गनेस महाल में शिफ्ट कर गए। ज्योति की शादी के दिन रो-रो कर फैज़ को गाया था… “कफ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो… कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जिक्र-ए-यार चले।”
आज भी हरा है दिल का शहर
ओह उस रात ही चार बोतल बियर पीया.. और चार दिन बाद घर से बाहर निकले.. डेढ़ साल हुए अब भी सब कुछ भूलना चाहते हैं पर भूल नहीं पाते… दाढ़ी बढ़ा ली.. अब ध्रुपद सिखने में तल्लीन हो गए हैं। पर हरा रंग से मोह न गया… आज भी सब कुछ उसकी यादों से हरा है… सावन की तरह… लेकिन दिल की बस्ती ऐसी उजड़ी है जिसे बसने में जमाने लगेंगे। तभी तो आज तक दरभंगा घाट पर शाम को बैठे रहते हैं… मानों अब आएगी, अब आयेगी।
अंतिम मुलाकात
दो महीना पहले एक मोटी सी लड़की आई.. गोद में बच्चा साथ में उसकी दो सहेली। और देखते ही कहा… “रग्घू.” ई पाँच मिनट उसे अवाक होकर ताकते रहे… “अरे ज्योति!” “बहुत दुबले हो गए आप.. और आज भी हरा शर्ट…” उसने आश्चर्य से पूछा था। “हाँ… लेकिन मेरा पराठा?” इतना कहते ही फफक पड़े थे झा जी… उस दिन ज्योति की आँखों में उमड़े समन्दर के आगे गंगा की लहरें भी खामोश थी… और बनारस भी।