रोजी गई नोएडा, लौंडे हुए विधवा
रोजी बीटेक करने नोएडा क्या चली गयी, कई लौंडे भरी जवानी में विधवा हो गये। दिल का सुहाग ऐसा उजड़ा कि परदीपवा एयरफोर्स में भर्ती होकर अब पापा बनने वाला है। चनमनवा टीडी कॉलेज में नेता होकर समाजवाद में आजकल ठेकेदारी करा रहा है। अभी रोड उखाड़ने का काम मिला है उसको.. कहता है “रोड तो उखाड़ ही दूंगा, लेकिन रोजी ने जो प्यार में दर्द दिया है, उसको कोई समाजवाद कैसे उखाड़ सकता है”?
सन्दीपवा: तीसरे नंबर का प्रेमी
हाँ सन्दीपवा, रोजी का तीसरा प्रेमी। कभी स्कूल में दिन भर इतिहास-भूगोल की नोटबुक में रोजी का फोटो बनाता था। उसको भी रोजी ने दस ही दिन प्यार किया था। दस दिन में लौंडे ने पता नहीं कितना प्यार किया, लेकिन कौशल विकास इतना जरूर हो गया कि वो अब घर-घर घूम-घूम खिड़की-दरवाजा पेंट कर रहा है। कहता है “उसकी यादों को हरे रंग से पेंट करता हूँ।”
सुशील जी: शायर-ए-आज़म का दर्द
एक सुशील जी थे, उसके परम वरिष्ठ प्रेमी.. रात-दिन रोजी के लिये शायरी और कविता लिखकर, मोहल्ले में माहौल साहित्यिक बनाने का असफल बीड़ा उठाया ही था कि तब तक उनको पता चला कि रोजी का सेटिंग आटा चक्की वाले रजेसवा से हो गया है। हाय! सुशील जी ने दिल पर पत्थर रखकर अपने जीवन की अंतिम कविता लिख डाली:
“चनमन, परदीप, कभी सन्दीप पे मरती हो
हाय! इश्क भी तुम समाजवादी करती हो।”
प्रेम का यूपी मॉडल: समाजवादी विकास
लेकिन भाईयों-भौजाइयों… मुझे परदीपवा, चनमनवा, सन्दीपवा को देखकर कभी-कभी लगता है कि ये प्रेम के समाजवादी विकास का यूपी मॉडल है। परदीप आजकल डेजी से इश्क फरमा रहा है। चनमन को एक भौजी बहुत लाइन देती हैं। सन्दीप भी मोहल्ले के शर्मा अंकल की बेटी को रोज निहारता है। आज ये समाजवादी प्रेम होली में सेक्यूलर हो गया है।
रोजी की वापसी: मोहल्ले में हलचल
रोजी कल ही नोएडा से घर आ गयी। आज सुबह जब कैप्री पहन दूध लेने जा रही थी, तब मोहल्ले के मोड़ पर हलचल देखने लायक थी.. लग ही नहीं रहा था कि आज होली है.. एकदम ईद का माहौल था। वो लौंडे, जिनको पता नहीं कि उनका बीए में कौन-कौन सा सब्जेक्ट है, वो भी सबको बता रहे थे – “रोजी मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ती है, तीसरा सेमेस्टर है।” जिस मोहल्ले के कलुआ को पता नहीं कि वो कल नहाया था या नहीं, वो भी बता रहा था – “रोजी वाइल्ड स्टोन लगाती है।”
सबके चेहरे पर न जाने कितने दिन बाद आज रौनक आई है। वो तो भला हो मोहल्ले के वर्मा जी के किरायेदार की बेटी का, वरना मोहल्ले के सारे लौंडे रोजी के जाने के बाद सन्यास ही ले लिये होते।
खेदन-नवेडा से आये भाई-भौजाई
इधर कल खेदन-नवेडा से भाई-भौजाई आ गये। भौजी के लिये चार दर्जन चूड़ी, लहरिया बिंदी और अलता लाये हैं। भौजी के गोड़ तो जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.. लग रहा था कि उछलकर आसमान में छेद कर देंगी।
पिंकी-मंटुआ का इश्क
पिंकिया भी आज फ्रॉक-सूट खरीद कर लाई है। मंटुआ के बाबूजी ने नया कपड़ा खरीदने से मना कर दिया है.. कहते हैं “अप्रैल में भइया के ब्याह में खरीदेंगे।” पिंकिया को पता चला तो वो उदास हो गयी और बड़े प्यार से कहा “जाने दो, तुम नया नहीं पहनोगे तो हम भी नहीं पहनेंगे।”
आय हाय… इस इश्क की ऊंचाई को मैं नाप ही रहा था कि तब तक देखा कि बैंगलोर, अहमदाबाद, जयपुर और दिल्ली रहने वाले तमाम लोग गाँव आ चुके हैं। भाई, भौजाई सब। सब पैर छू रहे हैं, एक-दूसरे से छुआ रहे हैं। क्या अद्भुत संस्कारी और संघी माहौल हो गया है गाँव में, कह नहीं सकते।
आधुनिक भौजाइयों की समस्या
इधर जितनी नई भौजाइयां मोहल्ले आई हैं – मने एंड्रॉयड की लॉलीपॉप वर्जन वाली – उनको कौन रंग लगाएगा, ये चर्चा का विषय है। क्या है कि आजकल की बीटेक-एमटेक वाली भौजाइयां इतनी नाजुक होती हैं कि उनके मुँह से ‘शीट, ओफ्फ, हाउ रबिश, नॉनसेंस’ टाइप नखरे देखकर मन करता है कि खुद ही अपने गाल में रंग पोतकर घर चले आएं।
वो पुरानी भौजाइयाँ
अरे, एक वो भी तो भौजाई ही थीं – सीमा और प्रतिमा भाभी टाइप – इंटर, बीए वाली। मने अभी देवर जी हाथ में रंग लेकर पानी के बारे में सोच ही रहे हैं कि तब तक देवर जी का पेंट और गंजी खुलकर अधोगति को प्राप्त हो जाता था। देवर जी की इज्जत का ईंधन जलने के बाद भौजाइयों की हँसी देखने लायक होती थी। समय परिवर्तनशील है, खैर।
गाँव की होली: जाति-पाति का घुलना-मिलना
कल गाँव में सिरपत कुम्हार, गंगा लोहार, बेचू तुरहा, ओकील चमार और मोहन पांडे, रजिंदर मिश्रा एक साथ जोगिरा और फगुआ गा रहे थे। सम्मत बाबा लोहिया को खूब गवाया गया, खूब जोगिरा बोला गया।
दिलीप मंडल जी की कमी
फगुआ गायन हो रहा था कि मुझे इस होली में एक डांसर की कमी महसूस हुई। दिलीप मंडल जी का नाम कई बार जेहन में आया.. सोचा उनसे कहूँ कि महाराज, एक ठुमका लगा दीजिए न इस हमारे गाँव वाले फगुआ पर।
बाबा की याद और जमींदारी का दर्द
तब तक सिरपत कुम्हार बोले – “ई बबुआ संहु राय के नाती हो न? आज चार काठा खेत हम उनके चलते जोत रहे हैं, ना त जीतन चमार हमको फर्जी तरीके से बेदखल कर दिया था।”
हाय…! हम अपने बाबा और आजी को क्यों नहीं देख पाए, इसका दो घंटा अफसोस रहा।
सोशल मीडिया का मोतियाबिंद
फेसबुक खोला तो देख रहा हूँ कि जिनको राहुल गांधी में पीएम नज़र आता था, उनको कन्हैया जी में भगत सिंह नज़र आने लगे हैं। उनकी नज़र को नज़र न लगे, क्योंकि उनके आँखों के इस मोतियाबिंद का कोई इलाज नहीं है। अब अफजल प्रेमी गैंग के स्टार नेता को भगत सिंह कहा जा रहा है। आज भगत सिंह कितने कष्ट में होंगे, कहा नहीं जा सकता। तीनों शहीदों को नमन।
होली: एंटीबायोटिक फॉर द सोल
24 घंटा फेसबुक चलाने वाले कुछ लोगों से निवेदन है कि महाराज.. आज और कल तो जरा आराम करिये… आप मानसिक बीमार हो गये हैं। होली, दिवाली, दशहरा एंटीबायोटिक है.. ले लीजिये, साल भर फिट रहेंगे।




